Atfal Compass
Healthy HabitsAges 6–10

सेहतमंद ज़िंदगी और खेलों का सफ़र

Narrator

एक ख़ूबसूरत और हरे भरे इलाक़े में ख़ालिद और अब्दुल्लाह नामी दो अच्छे दोस्त रहते थे। उन दोनों की दोस्ती बहुत गहरी थी, लेकिन उनकी पसंद और आदतें एक दूसरे से बिल्कुल मुख़्तलिफ़ थीं।

ख़ालिद एक ऐसा लड़का था जिसे खेल कूद और जिस्मानी सरगर्मियों का बहुत शौक़ था। वह शाम होते ही क्रिकेट, फ़ुटबॉल और दौड़ने के लिए मैदान का रुख़ करता था। उसकी यह आदत उसे तरो-ताज़ा और चाक़ो-चौबंद रखती थी।

इसके बरअक्स अब्दुल्लाह को बाहर जा कर खेलने से कोई दिलचस्पी नहीं थी। वह सारा दिन अपने कमरे में बैठा रहता और मोबाइल या कंप्यूटर पर घंटों वीडियो गेम्स खेलता रहता था। उसे स्क्रीन की दुनिया इतनी अच्छी लगती कि बाहर की ताज़ा हवा और सूरज की रोशनी से उसका कोई वास्ता ही न रहा था।

ख़ालिद अक्सर अब्दुल्लाह को अपने साथ मैदान में चलने की दावत देता। वह कहता: "अब्दुल्लाह! आओ, मेरे साथ फ़ुटबॉल खेलते हैं, मैदान में दौड़ने से जिस्म तंदुरुस्त रहता है और दिमाग़ भी तेज़ होता है।"

लेकिन अब्दुल्लाह हर बार कोई न कोई बहाना बना कर इनकार कर देता और कहता: "अरे ख़ालिद! बाहर धूप में कौन पसीना बहाए? मुझे मोबाइल गेम्स में ही बहुत मज़ा आता है, मेरा वक़्त मज़े से गुज़र रहा है।"

ख़ालिद उसकी यह बात सुन कर चुप हो जाता, लेकिन वक़्त गुज़रने के साथ साथ अब्दुल्लाह की यह बुरी आदत उसकी सेहत पर असर अंदाज़ होने लगी।

कुछ महीने ऐसे ही गुज़रे कि अचानक अब्दुल्लाह की तबीयत में तब्दीली आने लगी। बग़ैर किसी मेहनत के भी उसे शदीद थकावट महसूस होने लगी। सुबह उठते वक़्त चक्कर आने लगते, जिस्म में सुस्ती और कमज़ोरी रहने लगी। यहाँ तक कि उसका पढ़ाई में भी दिल नहीं लगता था; जब वह किताब खोलता तो चंद मिनट बाद ही उसका सर दर्द करने लगता और तवज्जोह हट जाती। वह इन मसाइल की वजह से काफ़ी परेशान रहने लगा।

आख़िरकार एक दिन अब्दुल्लाह ने हिम्मत की और अपनी यह तमाम परेशानियाँ ख़ालिद के सामने रख दीं।

ख़ालिद, जो अपनी सेहत का बहुत ख़याल रखता था और फ़िटनेस के उसूलों से वाक़िफ़ था, उसने अपने दोस्त की बात बहुत तवज्जोह से सुनी। सारा माजरा समझने के बाद ख़ालिद ने प्यार से अब्दुल्लाह को समझाया: "अब्दुल्लाह! तुम्हारी इन तमाम बीमारियों और थकावट की जड़ तुम्हारा दिन भर एक ही जगह बैठे रहना और सिर्फ़ स्क्रीन का इस्तेमाल है। जिस्मानी खेलों में हिस्सा न लेने की वजह से तुम्हारा ख़ून गर्दिश नहीं करता और तुम्हारे पट्ठे कमज़ोर हो रहे हैं।"

ख़ालिद ने मज़ीद कहा: "खेल कूद सिर्फ़ तफ़रीह नहीं हैं, बल्कि यह हमारे जिस्म को ताक़तवर बनाते हैं, दिमाग़ को ऑक्सीजन फ़राहम करते हैं और पढ़ाई में तवज्जोह मरकूज़ रखने की सलाहियत को भी बढ़ाते हैं।"

अब्दुल्लाह को ख़ालिद की बात बिल्कुल ठीक लगी। उसने फ़ैसला किया कि अब वह अपनी इस आदत को बदलेगा।

अगले दिन से अब्दुल्लाह ने ख़ालिद के साथ मैदान में जाना शुरू कर दिया। शुरू में उसके लिए दौड़ना और खेलना थोड़ा मुश्किल था, क्योंकि उसका जिस्म आदी नहीं था। लेकिन ख़ालिद ने उसकी बहुत हौसला अफ़ज़ाई की और उसे साथ ले कर चला।

दिन गुज़रते गए और अब्दुल्लाह की मेहनत रंग लाने लगी। रोज़ाना की जिस्मानी वरज़िश, ताज़ा हवा और खेलों की वजह से उसकी थकावट और चक्कर आने की शिकायत कम होने लगी। चंद हफ़्तों के अंदर ही वह अपने आप को पहले से कहीं ज़्यादा ताक़तवर, चाक़ो-चौबंद और तंदुरुस्त महसूस करने लगा। अब उसकी पढ़ाई में भी तवज्जोह लगने लगी थी और उसकी तमाम परेशानियाँ हमेशा के लिए ख़त्म हो गई थीं।

अब्दुल्लाह को अपनी ग़लती का एहसास हो चुका था और उसे मालूम हो गया था कि ज़िंदगी में तवाज़ुन कितना ज़रूरी है।

ज़िंदगी में तमाम सरगर्मियों के दरमियान तवाज़ुन रखना बहुत ज़रूरी है। डिजिटल गेम्स या पढ़ाई के साथ साथ जिस्मानी खेल कूद भी उतने ही ज़रूरी हैं, वरना लापरवाही हमारी नशो-नुमा और सेहत को शदीद नुक़सान पहुँचा सकती है।

मिलकर बात करें

  1. अब्दुल्लाह को बग़ैर मेहनत के थकावट और चक्कर क्यों आने लगे?
  2. ख़ालिद ने सिर्फ़ ग़लती बताने के बजाय अपने दोस्त की मदद कैसे की?
  3. आप रोज़ाना स्क्रीन पर कितना वक़्त गुज़ारते हैं और बाहर कितना खेलते हैं? आपके लिए अच्छा तवाज़ुन कैसा होगा?

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