पार्क का पुरअसरार अजनबी और एक अहम सबक़
शाम का वक़्त था, और लाहौर का मशहूर जाम-ए-शीरीं पार्क बच्चों की हँसी और चहल पहल से गूँज रहा था। हरी हरी घास पर सुनहरी धूप फैली हुई थी, और झूलों के पास बच्चों का शोर दिल को भला लग रहा था।
अब्दुल्लाह और ख़ालिद, जो अब थोड़े बड़े और समझदार हो चुके थे, पार्क के एक कोने में फ़ुटबॉल खेलने में मसरूफ़ थे। उनके साथ अब्दुल्लाह का छोटा भाई उमर भी आया हुआ था, जिसकी उम्र अभी सिर्फ़ साढ़े तीन चार साल के क़रीब थी। उमर अपने नन्हे नन्हे हाथों में प्लास्टिक की एक छोटी सी कार लिए रेत में ट्रैक बना रहा था और अपनी ही मस्ती में मगन था।
दोनों बड़े लड़के खेल में मसरूफ़ थे, लेकिन उनकी एक आँख मुसलसल उमर पर भी थी।
इतने में, पार्क के दूसरे सिरे से एक नामालूम शख़्स आहिस्ता आहिस्ता उनकी तरफ़ बढ़ा। उसके चेहरे पर एक अजीब सी मुस्कुराहट थी, ऐसी मुस्कुराहट जो बज़ाहिर तो बहुत दोस्ताना लग रही थी लेकिन उसकी आँखों में कुछ ऐसा था जो ठीक नहीं लग रहा था। वह शख़्स ऐसे ज़ाहिर कर रहा था जैसे वह उन बच्चों को बहुत अच्छे से जानता हो।
उस अजनबी ने इधर उधर देखा। जब उसने देखा कि अब्दुल्लाह और ख़ालिद अपने खेल में ज़रा सा ग़ाफ़िल हैं और उमर उनसे कुछ फ़ासले पर अकेला खेल रहा है, तो वह सीधा उमर के पास आ गया।
वह शख़्स उमर के बिल्कुल क़रीब झुका और प्यार भरी आवाज़ में मुस्कुरा कर बोला: "अरे मेरे प्यारे उमर! कैसे हो? तुम तो बहुत प्यारे बच्चे हो। देखो, वहाँ झूलों के पास कितने मज़े मज़े के खिलौने रखे हैं और एक बड़ी सी स्लाइड भी है! आओ मेरे साथ, मैं तुम्हें वहाँ ले कर चलता हूँ और तुम मेरे साथ बहुत मज़े से खेलना। बोलो, चलोगे मेरे साथ?"
उमर ने अपनी बड़ी बड़ी मासूम आँखों से उस अजनबी को देखा। वह छोटा था, इसलिए यह नहीं समझ सका कि यह शख़्स कौन है। वह उठ कर उसके साथ जाने ही वाला था कि इतने में ख़ालिद की नज़र उस अजनबी पर पड़ गई।
ख़ालिद का दिल धक से रह गया। उसने फ़ौरन अब्दुल्लाह को कोहनी मारी और कहा: "अब्दुल्लाह! वह देखो, उमर के पास कोई अजनबी खड़ा है और वह उसे अपने साथ ले जाने की कोशिश कर रहा है!"
अब्दुल्लाह ने पलट कर देखा तो उसके तेज़ दिमाग़ में फ़ौरन ख़तरे की घंटी बज उठी। वह एक लम्हे के लिए भी नहीं हिचकिचाया। दोनों ने पूरी ताक़त से आवाज़ लगाई: "उमर! फ़ौरन इधर आओ! जल्दी भाग कर हमारे पास आओ!"
जब उमर ने अब्दुल्लाह और ख़ालिद की इतनी सख़्त और पक्की आवाज़ सुनी, तो वह उस अजनबी को छोड़ कर घबराया हुआ दौड़ता हुआ उनके पास आ गया और अब्दुल्लाह की टाँग से लिपट गया।
जैसे ही अब्दुल्लाह और ख़ालिद ने उमर को ज़ोर से पुकारा और तेज़ी से उसकी तरफ़ लपके, वह अजनबी घबरा गया। उसे अंदाज़ा हो गया कि यह बच्चा अकेला नहीं है और इसके साथ वाले लड़के होशियार हैं। वह फ़ौरन पीछे हटा, मुँह ही मुँह में कुछ बड़बड़ाया, और तेज़ क़दमों से भीड़ में ग़ायब हो गया।
अब्दुल्लाह ने झुक कर नन्हे उमर को प्यार से गले लगाया। उसका अपना दिल अभी तक तेज़ी से धड़क रहा था। उसने उमर को नरमी लेकिन बहुत संजीदगी से समझाया: "उमर! मेरी बात सुनो और इसे हमेशा याद रखना! दुनिया का कोई भी इंसान हो, अगर वह तुम्हें कहे कि मेरे साथ आओ, चॉकलेट दूँगा, या पार्क के दूसरे हिस्से में ले जा कर खेलूँगा, तो कभी भी किसी अजनबी की बात पर यक़ीन नहीं करना और न ही उसके साथ जाना! यह बहुत ख़तरनाक हो सकता है, कोई तुम्हें नुक़सान पहुँचा सकता है।"
ख़ालिद ने भी बात आगे बढ़ाते हुए कहा: "और हाँ उमर! जब भी कोई अजनबी तुम्हें बुलाए तो फ़ौरन भाग कर हमारे पास आ जाना या अम्मी अब्बा के पास चले जाना। अगर कोई जान पहचान वाला भी हो, तब भी पहले जा कर अम्मी या अब्बा से पूछना और इजाज़त लेना। अगर वह कहें कि हाँ, तुम जा सकते हो, तभी जाना, वरना कभी किसी के साथ नहीं जाना!"
उमर ने अपना नन्हा सा सिर हिलाया और समझदारी से बोला: "भैया! मैं समझ गया हूँ। अब मैं कभी किसी अजनबी के साथ नहीं जाऊँगा, और कोई भी बात होगी तो फ़ौरन आपको और अम्मी को बताऊँगा!"
अब्दुल्लाह और ख़ालिद ने उमर को एक बार फिर प्यार किया। उस शाम के बाद से वह उमर का और ज़्यादा ख़याल रखने लगे, और यह वाक़िआ उन सबके लिए हमेशा के लिए एक बहुत बड़ा सबक़ बन गया।
बच्चों की हिफ़ाज़त के लिए होशियारी और बेदारी बहुत ज़रूरी है। किसी भी अजनबी के फ़रेब या झूठे वादों में हरगिज़ न आएँ, और ऐसी किसी भी सूरतहाल में फ़ौरन अपने वालिदैन या बड़ों को मुत्तला करें।
मिलकर बात करें
- अजनबी ने उमर को साथ ले जाने के लिए क्या लालच दिया?
- अगर कोई अनजान शख़्स आपको साथ चलने को कहे तो आप क्या करेंगे?
- वह कौन से बड़े हैं जिनके पास आप हमेशा मदद के लिए भाग कर जा सकते हैं? आएँ मिल कर उनके नाम लें।